International Journal of Home Science
2025, VOL. 11 ISSUE 1, PART G
मोटे अनाज और महिला सशक्तिकरण: कुटीर उद्योग का सहारा
Author(s): उर्वशी कोइराला
Abstract:
भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन गया है जो खाद्य सुरक्षा पोषण संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है। मौजूदा कृषि पद्धतियां पर्यावरण पर भारी दबाव डाल रही है और कुपोषण की समस्या अभी भी गंभीर हैं। देश में समग्र स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा में वृद्धि के लिए मोटे अनाज को बढ़ावा देना भारत के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा बदलाव हो सकता हैं। भारत कुपोषण से जूझ रहा है। मोटे अनाज अत्यधिक पौष्टिक सुखा प्रतिरोधी फसले हैं जो देश में स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने की क्षमता रखती है। मोटे अनाज जलवायु अनुकूल पोषक तत्वों से भरपूर और पर्यावरण संरक्षण में सहायक है। मोटे अनाज (जैसे बाजरा, ज्वार, रागी, कोदो, कुटकी, सांवा आदि) भारत की प्राचीन कृषि संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। ये न केवल पोषण का स्रोत हैं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण आधार है। पोषण की दृष्टि से देखा जाए तो किसानों विशेषकर महिलाओं के लिए आय का एक अस्थायी स्रोत भी बन सकते हैं दूसरी ओर महिला सशक्तिकरण आज के समय की एक प्रमुख आवश्यकता है जब महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती है तो उनका आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान दोनों बढ़ते हैं ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी व आत्मनिर्भर बनाने में कुटीर उद्योग धंधे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं जब महिलाएं सशक्त तथा स्वालंबी होगी तो उनके साथ घरेलू हिंसा शोषण तथा दोयम दर्जे जैसी घटना घटित नहीं हो पाएगी कुटीर उद्योगों का विकास महिला सशक्तीकरण की दिशा में वरदान साबित हो सकता है। जागरूक महिलाओं को इस दिशा में आगे आना होगा तथा घर-घर में विकसित कुटीर उद्योग धंधे महिलाओं को स्वालंबन के साथ सशक्तिकरण को प्रदान करेंगे ही साथ ही साथ देश के आर्थिक विकास के ढांचे को भी मजबूत व विकसित करने में योगदान प्रदान करेंगी। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल शिक्षा प्राप्त करना नहीं बल्कि आर्थिक सामाजिक और मानसिक रूप से आत्मनिर्भर बनना है। कुटीर उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी उन्हें रोजगार देती है, आत्मविश्वास बढ़ाती है।